खुद को देख पाता

Author: kapil sharma / Labels:

अनसुलझे से चेहरे,
जवाब ढूँढती नज़रें
आईने के उस छोर  से
घूरते रहते हैं, हर रोज़
हर बार एक नया शक्स,
चौखट के पार से, 
सायल बन आ जाता हैं
छीलता हैं ज़ेहन को,
रूह को सालता हैं
कभी गुजरते, कभी गुजरे,
कभी आने वाले
वक़्त की बड़ी 
अजीब तस्वीर दिखाता हैं
...काश इस आईने के आगे मैं
कभी तेरी नज़रें लेकर, खुद को देख पाता 

0 comments:

अंतर्मन