"तुम कुछ कहते क्यों नहीं?"

Author: kapil sharma / Labels:

फिर खाली सफ्हे के सामने,
बैठा देती हैं, ये मज़बूरी,
ये तलब, लफ़्ज़ों में पिरोने की,
हर उस बेजुबान अरमान को,

हर उस बेशक्ल ख्वाब को,
अधुरी रात को, आसमान को,
आधे अधूरे माहताब को,
जो तुम्हारी गैर मौजूदगी में
मुझसे सिर्फ तुम्हारी बातें करते हैं
तुम्हारा हाल भी मुझसा होगा,
 इस बात का यकीं दिलाते हैं
तुम आओ या ना आओ,
चाहे न वादा करो, न निभाओ
तुम्हारा इंतज़ार करवाते हैं,

...और जब तुम रूबरू होती हो,
बेईमान दोस्तों की तरह,
मुझे बिलकुल खाली,
बिलकुल तनहा,
छोड़ कर चले जाते हैं,
बिलकुल निहत्ता,
तुम्हारे सवाल के सामने,
की "तुम कुछ कहते क्यों नहीं?"


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