त्रिवेणी

Author: kapil sharma / Labels:

अखबार की कतरनों सी यादें
धुल चढ़े अलबमों में दबी रहती,

नाशुक्रा तूफ़ान जो घर से ना गुजरता
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यकीन दिल को भी आ जाये,
सब भूल गए हो तुम,

फेसबुक पर तस्वीरों  को like करना जो छोड़ो तुम
  
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सच ही कहा था तुमने, ज़िन्दगी हँसीमजाक में कट जाएगी
तुम सबके चेहरे की हँसी बन गए
...मैं सबकी ज़िन्दगी का मजाक
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दुआ, अदा, हया, शमा
वो मुस्कुराते रहे

नजर के रंग बदलते रहे
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क्या रंज था?

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वो जो एक लहजा सुकूँ भरा
वो  जो प्यार से प्यारा तंज़ था
अश्क गिर पड़े तो दर्द हैं,
पलकोंपे थे, क्या रंज था?

अब भी उन कुचों से

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...अब भी उन कुचों से गुजरते हुए
खामोश हो जाती हैं
जुबां सोच की
सारे ख़्याल 
थम से जाते हैं
नज़रें उस खिड़की को
चुरा ले जाना चाहती हैं

बीते लम्हें,
सर्द कोहरे की तरह
न जाने कहाँ से
उतर आते हैं
स्लेटी हो चली
दोपहर कुछ
ज्यादा उदास
लगने लगती हैं
आहट क़दमों की
उस रास्ते पर
अजब कशमकश
से गुजरती हैं
...अब भी उन कुचों से गुजरते हुए


 

प्रश्नों का प्रवाह

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प्रश्नों का प्रवाह
निरंतर, 
निर्लिप्त
मेरी हंसी से
मेरे आँखों की
नमी से

मग्न अपने आप में
अथक न जाने 
किस अपेक्षा से?
निर्मोह उत्तरों की
प्रतीक्षा से
सम्यक, जीवन की
व्याख्या से
प्रश्नों का प्रवाह
निरंतर, निर्लिप्त

प्रवाहित, एकदिश
मंदिर से मधुशाला
सर्वव्याप्त
क्या संत,
क्या पीनेवाला
समग्र, विलेय
क्या हलाहल
क्या हाला
प्रश्नों का प्रवाह
निरंतर, निर्लिप्त

ये लम्हा

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साहील के रेत पर
निशाँ  पैरों के तलाशने,
ये लम्हा बेवक्त घर से निकला था.
कुछ रूठा सा कुछ टुटा सा,
फिर बिखरने या संभलने,
ये लम्हा बेवक्त घर से निकला था.

उस कमरे की एक अलमारी,
यही कही वह छिपती थी,
नादान बेचारा, उसे खोजने
ये लम्हा बेवक्त घर से निकला था.

किताबों की मानिंद

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हर्फ़, हर्फ़ पढ़ता रहूँ
सफ़्हा, सफ़्हा जीता रहूँ
किताबों की मानिंद,
कुछ लोग 
ज़िन्दगी में अज़ीज़ होते हैं.
     
 

अंतर्मन