रूह की कीमतें

Author: kapil sharma / Labels:

मंदिर हज़ार ||
हज़ार मस्जिदें देख लो ||
खुदा के घर में,  ||
नाखुदा की मल्कियतें देख लो ||
शायद वो इक सौदा, ||
 तुमको भी पेश कर दे ||
चलो बाज़ार "नुक्ता",  ||
रूह की कीमतें देख लो ||

गैर मौजूदगी में तेरी

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यूँ भी हुआ हैं,
गैर मौजूदगी में तेरी
कई सारे ख्वाब तुझसे बाबस्ता
मुझे घेर कर, तेरे बारें में
सवाल करने लगे हैं
पूछते हैं मुझसे
क्या उन आँखों से,
गहरी झील हैं कोई?
क्या उन जुल्फों से,
स्याह रात हैं कोई?
हैं कोई, जाम,
उन लबों से नशीलें
क्या उन धडकनों से,
सुरीली बात हैं कोई?

...अब सोचता हूँ
क्या सचमुच में
जवाब तलाशते हैं
ये खाव्बों ख्याल,
तुमसे जुड़े हुए
या सिर्फ बेकसी पर मेरी
कहकहे लगाने चले आते हैं
गैर मौजूदगी में तेरी


हाँ अगर तू मुस्कराकर कह दे, "बस ऐसा ही है"

Author: kapil sharma / Labels:

चाँदनी में नहाता,
खुश मिजाज़ साहिल
गुनगुनाती लहरें
बेमालूम सी
बज़्म में शामिल
न रास्ता कोई
ना मंजिल
ना सबब
ना कोई हासिल
बस तू, मैं
और ये कैफियत
ये ज़िन्दगी का ख्वाब, या ख़्वाबों सी ज़िन्दगी हैं
यकीं अपनी खुशफेहमियों पर कर भी लू मैं
हाँ अगर तू मुस्कराकर कह दे, "बस ऐसा ही है"

अंतर्मन