हमें, आये कोई समझाने को?

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धागे भर का फर्क है बस,
हस्ती बनने को, बिगड़ जाने को
अपनी तो बन गयी, समझली हैं
हमें, आये कोई समझाने  को?


हम तो चले है, नूर तुम्हारा
साकी रहे सलामत अब,
बरकत रहे तुम पर रिंदों की,
नज़र न लगे तेरे मैखाने को


काँधे ले इश्काँ की दूकान,
हाट बाजार, हांक लगाए है,
नहीं नफा, नुक्सान बहोत है,
बतला दो, तुम ही दीवाने को


क्या किस्सा था, कैसे बयां का ,
जिक्र कर रहा था वो अजनबी
क्यों नम थी नज़र-ए -साक़ी,
क्यों दर्द हुआ था पैमाने को?

शेखजी का बतोला हैं

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इक मैं हुँ, इक मेरा मालिक,
मस्त-मौला हैं
बाकी सब किस्से, अफवाहें,
शेखजी का बतोला हैं
ख्वाब से एक वो जागा हैं,
या नया ख्वाब कोई खोला हैं
बेकल नज़र की
तश्ने रूहानी, कौन,
कहा तक टटोला हैं ?
कैसे बढ़ता ताप मनों का,
आतिशफ़िशाँ सा
ज़ेहनों दिल में
कैसे लावा खौला हैं ?
किसी जहाँ में,
किसी जंग में
फिर से
कान्हा बोला हैं
मैं सजदे में,
घुटनो के बल...
सारा मंज़र
इन आँखों ने
ना अब तक भुला हैं
इक मैं हुँ, इक मेरा मालिक,
मस्त-मौला हैं
बाकी सब किस्से, अफवाहें,
शेखजी का बतोला हैं


 

उसकी आँखें

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अनकही बाब सी
फरिश्तो  के ख्वाब सी
फ़लक पे रक्स करते
सितारों के ताब सी
किसी शायर की
पसंदीदा किताब सी
प्यासे रिंद को
कतरा ए शराब सी
...उसकी आँखें।।।

कोई नज़्म बस होने को है

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फिर से महक उठा हैं
पुरानी खुशुबुओं से पैरहन
कोई नज़्म बस होने को है
हज़ार ख्यालों से हामला हैं ज़ेहन
कोई नज़्म बस होने को है
कुछ यादें बीते अरसे के,
लरज़ लबों पे, पलकों पे सावन
कोई नज़्म बस होने को है
गूँजता मैकदा, हुजूम से रिन्दों के,
बैठे हैं कोने में "नुक्ता"
लिए तन्हा प्यास, तन्हा धड़कन
कोई नज़्म बस होने को है 

मसरुफी

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मसरुफी तूने,

इस तरह लाचार कर दिया

इश्क के नाम,

एक दिन कर ,

सारी ज़िन्दगी को

मोहब्बत से

फारिग कर दिया

इक बाँवरा सा इंसा था

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शौहरत तेरे,
अंदाज़-ए-सुखन की
तुझको हो मुबारक शायर,
मुझे बस इतनी दुआ दो,
के हयात यूँ याद रख ले,
इक बाँवरा सा इंसा था,
बाँवरी बातें करता था

रात ने हैं रख ली गिरवी मुझसे

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ऐसे दौर -ए - खस्ता हाल ने,
सवाल ए चैनो सुकूं को दिया जवाब
रात ने हैं रख ली गिरवी मुझसे,
मेरी नींदें, चाँद और सारे ख्वाब

वो बनकर अब्र आये बरसाने मुझपर
अपनी रूह का आब औ' ताब
हम बदकिस्मत सूखे रह गए,
ले आँखों में अश्क़ हाथों में शराब

बस इक डर के वक़्त के थपेड़े,
मुरझा न दे गुलदस्ता ए हयात
चुन चुन कर रख लिए है उसने,
सब के सब कागज़ के गुलाब

अंतर्मन