हमें, आये कोई समझाने को?

Author: Kapil Sharma / Labels:

धागे भर का फर्क है बस,
हस्ती बनने को, बिगड़ जाने को
अपनी तो बन गयी, समझली हैं
हमें, आये कोई समझाने  को?


हम तो चले है, नूर तुम्हारा
साकी रहे सलामत अब,
बरकत रहे तुम पर रिंदों की,
नज़र न लगे तेरे मैखाने को


काँधे ले इश्काँ की दूकान,
हाट बाजार, हांक लगाए है,
नहीं नफा, नुक्सान बहोत है,
बतला दो, तुम ही दीवाने को


क्या किस्सा था, कैसे बयां का ,
जिक्र कर रहा था वो अजनबी
क्यों नम थी नज़र-ए -साक़ी,
क्यों दर्द हुआ था पैमाने को?

2 comments:

Anonymous said...

Bahut khoob...
Earlier, I would be busy writing, you would be busy reading, let's do it vice versa now

kapil sharma said...

Wow it's such a koy to be read by u ;)

अंतर्मन