हमें, आये कोई समझाने को?

Author: kapil sharma / Labels:

धागे भर का फर्क है बस,
हस्ती बनने को, बिगड़ जाने को
अपनी तो बन गयी, समझली हैं
हमें, आये कोई समझाने  को?


हम तो चले है, नूर तुम्हारा
साकी रहे सलामत अब,
बरकत रहे तुम पर रिंदों की,
नज़र न लगे तेरे मैखाने को


काँधे ले इश्काँ की दूकान,
हाट बाजार, हांक लगाए है,
नहीं नफा, नुक्सान बहोत है,
बतला दो, तुम ही दीवाने को


क्या किस्सा था, कैसे बयां का ,
जिक्र कर रहा था वो अजनबी
क्यों नम थी नज़र-ए -साक़ी,
क्यों दर्द हुआ था पैमाने को?

शेखजी का बतोला हैं

Author: kapil sharma / Labels:

इक मैं हुँ, इक मेरा मालिक,
मस्त-मौला हैं
बाकी सब किस्से, अफवाहें,
शेखजी का बतोला हैं
ख्वाब से एक वो जागा हैं,
या नया ख्वाब कोई खोला हैं
बेकल नज़र की
तश्ने रूहानी, कौन,
कहा तक टटोला हैं ?
कैसे बढ़ता ताप मनों का,
आतिशफ़िशाँ सा
ज़ेहनों दिल में
कैसे लावा खौला हैं ?
किसी जहाँ में,
किसी जंग में
फिर से
कान्हा बोला हैं
मैं सजदे में,
घुटनो के बल...
सारा मंज़र
इन आँखों ने
ना अब तक भुला हैं
इक मैं हुँ, इक मेरा मालिक,
मस्त-मौला हैं
बाकी सब किस्से, अफवाहें,
शेखजी का बतोला हैं


 

अंतर्मन