शहर

Author: kapil sharma / Labels:

इस जाने पहचाने शहर के कई हिस्से,

जिनसे मेरे मरासिम ऐसे नहीं थे
अब मुझे गले लगाने दौड़ते है
जिन कुचों में मैं पहले नहीं गया
अब देख मुझे, एक तबस्सुम सी,
बेवजा चेहरे पे सज़ा लेते हैं

क्यों बता दिया...इसी शहर से गुजरी हो?

तुम

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कई मर्तबा यूँ भी हुआ है,
मेरे ख़्वाबों में तुम, मेरे साथ,
हर उस जगह  हो आये हो
जहाँ हम तुम  कभी नहीं गए
कई दफा, कई रात दोराहाया है 
ये ख़्वाब मैंने.
तुमने ही कहा था, ना
इक ख़्वाब को दोराहने  से बारहा
वो हकीक़त बन जाता हैं?
...तुम सही थी, ए हकीक़त मेरी!!!

साँसों में

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पल पल, लम्हा लम्हा
इतना यकीं साँसों में
छिपा आसमा पगला,
बावरी जमीं साँसों में

सब कुछ तो "नुक्ता" में
दे दिया, खुदाया
बना दी इक शक्स ने
फिर कैसे कमी साँसों में

जब भी देखा था उसको,
जुनूं में था, आज़ाद था
कल रात देखी हमने
कौन परस्ती साँसों में

तुम भी तो मौजूद वहां थे,
याद नहीं तुम्हे?
कितनी सारी सौंधी रातें,
अब हैं सुनी साँसों में

थके, रूठे, भीगे से काँधे,
तन्हा तन्हा तपती रात
रह का आगे हाल ना पूछो,
हाँ, साँस हैं थमी साँसों में

क्या क्या भरकर लाये थे
क्या छोड़ा, क्या संग किया?
तिनका तिनका रंज वो सारे
रेजा ये हसीं साँसों में

इक ख्याल ज़ेहन में

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इक ख्याल ज़ेहन में
आधा आधा सा
अधबना, प्यासा
रूठा रूठा सा

सेहरा सा तपता कभी
दरया सा बहता कभी
हदों से बढ़कर दरिंदा कभी
या मस्जिद से उठती
मासूम दुआ सा
इक ख्याल ज़ेहन में
आधा आधा सा

आधी रात को
चौक कर जागते
अधूरे, अधबुझे
अनमने ख़्वाब सा
गहमागहमी में
वक़्त की
थका माँदा सा

मनहूस मेरी तरह
मुझ जैसा अभागा सा
...इक ख्याल ज़ेहन में
...आधा आधा सा

क्षणिकाएं...

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थकी थकी सी रात
नींद से बैर मेरा
ज़ेहन में कौन्दते तूफ़ान,
ये बेआवाज़ सवेरा

चुप चुप कटते दिन
उनींदी उदास दोपहर
भारी कदम रास्ते
सर झुकाए शहर

अपलक देखती नज़रें
नजाने कहाँ गुम
सूखे बंजर सैलाब
खोये खोये हम

कोई और शह उस बाब सी क्या होगी?

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सूरत चाँद की, मेरे महताब सी क्या होगी?
चर्चा उसका रूमानी जितना,
कोई और शह, उस बाब सी क्या होगी?

चैन औ' सुकून नदारद हैं ज़ेहन से
इससे ज्यादा, बामौत, हालत खराब क्या होगी?

महक जो फैली है मेरे घर में इस बार
वहां पर खुशबु-ए-गुलाब क्या होगी?

क्यों पियालों की जरुरत हो अब मुझको,
साक़ी तुझसे बढ़कर शराब क्या होगी?

(बाब= बात)

वक़्त ज्यादा लगता नहीं

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उभरते दर्द को वक़्त ज्यादा लगता नहीं
तवील सच मेरा यहाँ टिकता नहीं
इस हयात के रंग ओ रूह में
पहचान बनाने की खातिर
उड़ता फिरता है सच बेआबरू, थमता नहीं
हर चेहरे में तलाश मेरी
ना हासिल ही रहती है
किन कुचों से नक्शु तुझे
तू ख़्वाब ही है, कागज़ पर रुकता नहीं
ये मुमकिन नहीं दुबारा,
मेहरबान हो खुदाया
जो एक बार हो गया,
मौजजा बार बार दिखता नहीं
यूँ तो ज़िन्दगी में,
हर चीज़ में नफा-घाटा
इक दर्द का कारोबार, तेरे
धोखा मुझे देता नहीं
उभरते दर्द को वक़्त ज्यादा लगता नहीं

रकीबों के किस्से

Author: kapil sharma / Labels:

रकीबों के किस्से इस शर्त पे सुनाते है वो,
अश्कों का आँखों में इक कतरा भी ना हो

नश्तर बेदर्दी से जुबां पर चलाते हैं खुद,
ये भी पूछते हैं, कुछ कहते नहीं, क्या बेजुबान हो?

कलाम अपना हमसे लिखाकर, भूल गए, हमराज़
रहम खुदा, मिले तो शक्ल पहचान ले वो

कुछ उफ्ताद ना हो जाये, ज़िक्र पर, खामोश हूँ,
वर्ना नाम कहाँ छोड़ते हैं, अफसाना गो

क्यों बेजार करते हो नहाक नींदें उसकी
गुमाँ सुर्ख आस्थिनों का क्यों उनको होने दो

चलो कुछ यादें तुम्हारी भुलाये

Author: kapil sharma / Labels:

चलो कुछ बातें हम भूल जाये
चलो कुछ यादें तुम्हारी भुलाये
जानता हूँ, माँझी यूँही साथ नहीं छोड़ता
क्यों ना हम अपना नया माँझी बनाये
चलो कुछ यादें तुम्हारी भुलाये
रास्ता लम्बा नहीं ज़िन्दगी का अगर
इक कदम तुम उठाओ, इक हम बढ़ाये
चलो कुछ यादें तुम्हारी भुलाये
क़ैद बरसों से इन पिंजरों में तुम भी, हम भी
क्यों ना इसकी दीवारों को ही ख़्वाबों के पर लगाये
चलो कुछ यादें तुम्हारी भुलाये

अंतर्मन