ज़िन्दगी चलती रही

Author: kapil sharma / Labels:

ज़िन्दगी चलती रही तेज़ अपनी रफ़्तार से
हम रह गए खुद ही के पिंजरों में गिरफ्तार से

न जाने क्या बेख्याली थी, कैसी कशमकश?
हाथ ज़ख़्मी होते रहे अपने ही हर एक वार से

इश्क के और भी अंजाम मुमकिन रहे हैं हमेशा
तकदीरें बदल जाती है, इकरार से, इनकार से

उस कातिल के हाथ देना, फैसला ए मुकदमा 
मासूम सी रूह  लिए, फना करें, मुझे जो प्यार से

8 comments:

induravisinghj said...

ज़िन्दगी चलती रही तेज़ अपनी रफ़्तार से
हम रह गए खुद ही के पिंजरों में गिरफ्तार से
jeewan ka saar inhi lines me hai,beautiful...

NUKTAA said...

behad shukriyaa induji :)

dr.mahendrag said...

Isq ke aur bhi anjam mumkin rahe hai hamesha,taqdeere badal jati hai,ekrar se, inkar se
SACH BILKUL SACH,SAB KUCH KAH DIYA HAIkuch lafjo Me -BADHAIE

NUKTAA said...

Bahut Shukriya Mahendraji

Aditya said...

//हम रह गए खुद ही के पिंजरों में गिरफ्तार से
//हाथ ज़ख़्मी होते रहे अपने ही हर एक वार से
//तकदीरें बदल जाती है, इकरार से, इनकार से

behtareen sirji.. behtareen :)

NUKTAA said...

Aditya bhai...shukriyaa :)

elixir_of_life said...

Interesting collection of work on this blog of yours Nuktaa... I am not much into Urdu poetry but you have a flair for it... Really liked it... Will be reading more :)...

NUKTAA said...

Thanks a lot Elixir

अंतर्मन