मुझको भी ये तरकीब सीखा, ऐ यार जुलाहे

Author: kapil sharma / Labels:



बन जाने में, बिगड़ जाने में,
धागे भर का फरक होता है
इस चादर से जाने कितनी
सिलाई अब तो उधड चली है
धागे कितने उलझ चुके
ये इक ताना, बना या बिगड़ा
मुझको इतना समझा दे यार जुलाहे
मुझको भी ये तरकीब सीखा, ऐ यार जुलाहे ...

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