तन्हा चलता

Author: kapil sharma / Labels:

कुछ और ज़माने तन्हा चलता
चुप ही हो जाता, कुछ न कहता
ये ख़ामोशी जो पहचान बन चली थी
वजूद बन जाती, कुछ न रह जाता
कुछ और ज़माने तन्हा चलता
चुप ही हो जाता, कुछ न कहता
ये स्याह रंग चेहरे का और गहराता
मैं ना जाने किन अंधेरों में खो जाता
कुछ और ज़माने तन्हा चलता
चुप ही हो जाता, कुछ न कहता

 ...खैर खुदा की नेमत जैसे तुम चले आये

अंतर्मन