ख्वाब अजीब हैं

Author: kapil sharma / Labels:

रुकी रुकी जमीं,
रुका हुआ  अम्बर,
उदास, अकेला
ठहरा ठहरा मंजर


टुटा सा इक
धनुक का कोना
शफक पे बिखरा पड़ा
शाम का सोना

जुदा जुदा से
पल वो सारे
रोते हँसते, 
चुप चुप रहते कभी,
कभी बहुत बतियाते 

दूर खड़ी वो
सहमी सहमी,
आँखों में लिए,
खौफ, राज़ या
कोई खुश फ़हमी

दुबका कुचला
अहम् मेरा,
बनते बिगड़ते
नातों का फेरा

फ़ैसले हज़ार,
रुके, ठहरे
गूंगा क़ाज़ी,
गवाह बहरे

ये तन्हा सिमटी रात अजीब हैं
इसके दामन के ये ख्वाब अजीब हैं

4 comments:

Ajit said...

bahot khub,

purnam aankhe,
rukhi gazale,
jalati jamin pe
bilkhati fasale.

Keep it up. And Good invention.

Ajit.

मनोज कुमार said...

यह रचना बहुत अच्छी लगी।

somyaa said...

antim do panktiyan dil ko chu lene wali hain.

NUKTAA said...

THANK YOU Ajit, Manoj ji and sowmya ji...

Hausla Afzai ka bahut bahut shukriyaa

अंतर्मन