ना जाने क्यों

Author: kapil sharma / Labels:

हज़ार अब्र शक के
क्यों उभरे हैं महफिल की आँखों में
बस एक उसका नाम ही
तो लिया था मैंने
क्यों तंज़ हजारो उड़ चले मेरी और
बस प्याला ही तो कसमसा कर
तोडा था मैंने
क्यों बह चले आंसुओ साथ
अरमान सारे मेरे
बस एक ख्वाब को इन
आँखों में रोका था मैंने

4 comments:

चंदन कुमार झा said...

बहुत खूब । सुन्दर रचना ।

please remove word verification then it wiil be easy to comment. Thanks

गुलमोहर का फूल

Amit K Sagar said...

चिट्ठा जगत में आपका हार्दिक स्वागत है. लिखते रहिये. शुभकामनाएं.
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उल्टा तीर पर हिंदी ब्लोग्स में पहली बार एक रिश्ते पर साहसिक बहस "फ्रेंड्स विद बेनेफिट्स"
व लेखक / लेखिका के रूप में ज्वाइन [उल्टा तीर]

Jyotsna Pandey said...

ब्लॉग की दुनिया में आपका स्वागत है, आपके लेखन में प्रखरता की आकांक्षी हूँ .......

lalit sharma said...

ब्लॉग जगत में आपका स्वागत हैं, लेखन कार्य के लिए बधाई
यहाँ भी आयें आपके कदमो की आहट इंतजार हैं,
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अंतर्मन