कुछ लफ्ज़ उठा रखे हैं

Author: kapil sharma / Labels:

कुछ अश्क संभाले है
हमने अपने कल के लिए
कुछ लफ्ज़ उठा रखे हैं
आने वाले पल के लिए

यूँ तो सावन सारे
बरस के बरसों बीत गए
बंजर ये जमीं, तकती है राह,
जाने किस बादल के लिए

जहां सँवारने का शौक,
अपना भी नातमाम रहा
हज़ार मसले खड़े हैं यहाँ
निज़ाम के हरेक हल के लिए

कितने घर उजड़े अब तक
जाने कितने खंडर हुए?
क्या कीमत मुनासिफ है,
शेख तेरे, महल के लिए?

शहर के बाशिंदे सारे,
मैं बुला लाया हूँ यहाँ,
नज़र आवाम की टिकी है,
रहबर तेरी, पहल के लिए
  
मंदिर, मस्जिद, मैखाने
सब दर खोल बैठे हैं
यूँ भी दुकानें सजती है
"नुक्ता", तुझ पागल के लिए

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