Author: Kapil Sharma /
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बड़े बेहतरीन ढंग से,
कभी लफ़्ज़ों में, कभी मुस्कानों में,
कभी अपनी पलकों के किनारों में,
छिपा लेती हो,
दर्द, बेचैनी,पीड़ा चुभन, तुम अमूमन
मगर उस दिन जब तुम कहते कहते कुछ
इक पल को जो सांस लेने रुकी
यूँ लगा तुमने तय कर लिए कई फासले
और आ गयी हो इतने करीब
के सारे चिलमन, सारे परदे
हटाकर अब, कह दोगी
जो बपर्दा था अब तक
उस एक पल में कई सौ दफा मेरी धड़कन,
रुकी चली, बढ़ी औ मद्धम हुयी
मगर अगले ही पल...
मुखौटे, चिलमन और कई सारे चहरे
फिर ओढ़ लिए तुमने और बस खिलखिलाकर हँस पड़ी