मत पूछो क्या हैं?

Author: Kapil Sharma / Labels:

कुछ दिन हुए हम अपने आपसे रूठे है
मायूस से एक कमरे में तन्हा से  बैठे है
एक रात की बात को सिरहाने लगा के
बेमन से लेटे रहते हैं
एक रात की बात को धड़कन बना के
खुद ही सुनते रहते हैं
कुछ दिन हुए हम अपने आपसे रूठे है
मायूस से एक कमरे में तन्हा से बैठे है
उस रात वो हमसे ये कहकर चले थे
नुक्ता तुम झूठे हो
कुछ दिल में रखते हो, कुछ और ही अपनी
जुबां से कहते हो
 कुछ दिन हुए हम अपने आपसे रूठे है
मायूस से एक कमरे में तन्हा से  बैठे है
यूँ सोच में तबसे दिल हैं और मैं हूँ
क्या सचमुच में नुक्ता मैं तुझसा बुरा हूँ?
क्या सचमच ये दुनिया तुझसे भली हैं?
क्या तुझे छोडके किसीको तेरी कमी खली हैं?
क्यों नादान ये बेसबब की बातें,
छीने सुकून दिन का और पुरसुकून रातें?
क्या जवाबो में कोई चैन मिलेगा,
क्या खोया है तेरा जो वापिस मिलेगा?
कुछ दिन हुए हम अपने आपसे रूठे है
मायूस से एक कमरे में तन्हा से  बैठे है




फनकार

Author: Kapil Sharma / Labels:

बड़े खूबसूरत वो घरोंदे बनाता
बड़े मुहतात से उनको सजाता
हर एक जोड़ पे कितने ख्वाब बसाता
हसरतो के रंग शौक से लगाता

फनकार था यकीनन वो बेहतर, बेहतर
हर नक्श में कैसे जोहर दिखाता
बड़ी दिलकश होती तखलीक उसकी
कई गुल अश्कों के उसपे खिलाता

...वो "ताबुतसाज़"... हैं और रहेगा
आखरी ज़रया-ए-सफर  वही तो बनाता

घर

Author: Kapil Sharma / Labels:

इक घर बनाना है
सब ही बनाते हैं
खरीददारी कर बाज़ार से
कितने रिश्ते सजाते हैं

जब तक तुम साथ हो

Author: Kapil Sharma / Labels:

नब्ज़ थामे रखो थोडी देर और,
देखो एक पल तो बाकी हैं अभी
दौडेगा थोडी दूर अभी ये,
भूल जायेगा दर्द सारे, रंज सारे
मचलेगा नये अरमानो संग अभी
नये ख्वाबो के पर लगाकर,
उड़ने की कोशीश भी करेगा

नादान हैं, मासूम हैं बड़ा,
...जी लेने दो इसे
...जब तक तुम साथ हो

सच्चे...झूठे

Author: Kapil Sharma / Labels:

कई सच हैं उसके
एक दुसरे से जुदा
क्या सारे सच हैं
क्या सारे सच, सच हैं
या कुछ सच्चे
और कुछ झूठे
या सारे सच झूठे हैं
...उसकी तो वो ही जाने

यूँही खामोश से

Author: Kapil Sharma / Labels:

यूँही खामोश से,
साहिल पर वो दोनों,
ख्वाब बुनते एक दूजे के,
एक दूजे के लिए,
उम्मीद में के कभी तो,
...ये समंदर सुख जायेगा

तेरा आँचल

Author: Kapil Sharma / Labels:

बहुत रोया हैं सूरज दिन भर
बहुत लम्बी थी खामोश शामें
उदास उदास थी रात आज भी
चाँद पे ताला लगाया था किसने?
क्यों बेवजह नींदें उचट रही हैं?
क्यों चुबता हैं बिस्तर मुझे?
क्या बात हैं ख्व्वाब सारे
बिलख बिलख कर उठते हैं?
क्यों लापनाह ये नज़रें मेरी
...तेरा ही आँचल तलाशती हैं?

अंतर्मन