तेरा आँचल

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बहुत रोया हैं सूरज दिन भर
बहुत लम्बी थी खामोश शामें
उदास उदास थी रात आज भी
चाँद पे ताला लगाया था किसने?
क्यों बेवजह नींदें उचट रही हैं?
क्यों चुबता हैं बिस्तर मुझे?
क्या बात हैं ख्व्वाब सारे
बिलख बिलख कर उठते हैं?
क्यों लापनाह ये नज़रें मेरी
...तेरा ही आँचल तलाशती हैं?

ना जाने क्यों

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हज़ार अब्र शक के
क्यों उभरे हैं महफिल की आँखों में
बस एक उसका नाम ही
तो लिया था मैंने
क्यों तंज़ हजारो उड़ चले मेरी और
बस प्याला ही तो कसमसा कर
तोडा था मैंने
क्यों बह चले आंसुओ साथ
अरमान सारे मेरे
बस एक ख्वाब को इन
आँखों में रोका था मैंने

दर्द ठहरता हैं देर तक

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दर्द ठहरता हैं देर तक
मगर एक दिन खत्म
हो ही जाता हैं
इसके  निशाँ लेकिन
कुछकर जाते नहीं हैं
बेचिराग घर की तरह
पड़े रहते हैं वहीँ के वहीँ
...एक बार एक चिराग जला दो
...एक बार इस रूह को सुकू मिल जाये
...भटकते भटकते थक गया हूँ

कौन पल हैं? कैसा वक्त? लम्हा कौन सा है

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कौन पल हैं? कैसा वक्त? लम्हा कौन सा है?
एक शक्स मुझे क्यों लगता खुदा सा हैं?

वो शक्ल मासूम सी

फरिश्तो की जलन

उसकी हर अदा

पुरवाई का झोंका सा हैं

कौन पल हैं? कैसा वक्त? लम्हा कौन सा है?
एक शक्स मुझे क्यों लगता खुदा सा हैं?

उसे ढाला तुने

किस फन से याखुदा मेरे

सपनो में पला हैं या

माँ की दुआ सा हैं

कौन पल हैं? कैसा वक्त? लम्हा कौन सा है?
एक शक्स मुझे क्यों लगता खुदा सा हैं?

जिंदा हूँ मैं

यकीं ख़ुद मुझे

आता नहीं

ता-क़यामत लम्हा क्यूँ ठहरा सा हैं

कौन पल हैं? कैसा वक्त? लम्हा कौन सा है?
एक शक्स मुझे क्यों लगता खुदा सा हैं?

यूँ भी दर्द की दवा हो कपकपाती लौ, जोरों की हवा हो

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यूँ भी दर्द की दवा हो
कपकपाती लौ, जोरों की हवा हो
सर्द अरमानो को एक मौत मिल ही जाए
जो वादों का सारे फ़िर से बयाँ हो
पनाहगाह मेरी, ख़ुद पनाह मांगती
तुम ही बोलो खुदाया अब मेरा क्या हो
यूँ भी दर्द की दवा हो
कपकपाती लौ, जोरों की हवा हो

दिन ठहरते हैं देर तक

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दिन ठहरते हैं देर तक

थक कर सूरज की छाँव में

उदास से, रूठे हुए

उस उजडे हुए गाँव में

...के शामों ने उन घरों से पनाह उठा ली हैं

बरगद के नीचे अब

कोई जमघट लगता नहीं

यूँ भी तो होता होगा

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मानता हूँ वो झूठ बहुत बोलता हैं
कभी कभी सच भी तो कहता होगा
उसकी ज़िन्दगी में
...यूँ भी तो होता होगा

मानता हूँ वो बड़ा दिलफरेब हैं
किसी के लिए तो दिल उसका भी बिलखता होगा
उसकी ज़िन्दगी में
...यूँ भी तो होता होगा

ज़िन्दगी की भागदौड़ ने थका ही दिया होता
किसी दरख्त की छाँव में चैन से सोता होगा
उसकी ज़िन्दगी में
...यूँ भी तो होता होगा

अंतर्मन